0:00 क्या होगा? अगर तुम्हारी जिंदगी की सबसे बड़ी लिमिटेशन तुम्हारे सरकमस्ट्ससेस नहीं बल्कि तुम्हारा अपना माइंड हो। तुम जो बार-बार सोचते हो, जिस पर विश्वास करते हो और जो बातें खुद से कहते हो क्या पता वही धीरे-धीरे तुम्हारी रियलिटी को शेप कर रही हो। हमारा कॉन्शियस माइंड सिर्फ वही देखता है जो सामने है। लेकिन सबकॉन्शियस माइंड उन बिलीव्स, फियर्स और थॉट्स को भीतर स्टोर करता रहता है जो बिना महसूस हुए हमारे डिसीजंस और एकशंस को इन्फ्लुएंस कर सकते हैं। डॉक्टर जोसेफ मर्फी की द पावर ऑफ योर सबकॉन्शियस माइंड इसी हिडन पावर को समझने की जर्नी है। क्यों कुछ लोग फेलियर के बाद भी आगे बढ़ते हैं? जबकि कुछ लोग सक्सेस के करीब पहुंचकर भी खुद को रोक लेते हैं? क्या थॉट्स और बिलीव्स को बदलकर हम अपने बिहेवियर और फ्यूचर की डायरेक्शन बदल सकते हैं? इस ऑडियो बुक में हम जानेंगे कि सबकॉन्शियस माइंड कैसे काम
0:46 करता है और सबसे जरूरी बात क्या हम इसे कॉन्शियसली कंट्रोल कर सकते हैं। तो तैयार हो जाइए अपने ही माइंड की उस दुनिया को एक्सप्लोर करने के लिए जो शायद आपकी जिंदगी को आपकी सोच से कहीं ज्यादा कंट्रोल करती है। चैप्टर वन द ट्रेजर हाउस विद इन यू। आप एक ऐसे खजाने के ऊपर बैठे हैं जिसकी कोई सीमा नहीं है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ज्यादातर लोग अपनी पूरी जिंदगी इस बात से अनजान रहते हैं कि उनके भीतर असीमित शक्ति का एक विशाल भंडार छिपा है। वे बाहर दुनिया में सफलता, खुशी और शांति तलाशते रहते हैं। जबकि उनके अंदर वह सब कुछ मौजूद है जिसकी उन्हें कभी भी आवश्यकता हो सकती है। कल्पना कीजिए कि एक इंसान सारी उम्र गरीबी में बिता देता है। यह सोचकर कि उसके पास कुछ नहीं है। जबकि उसके घर के ठीक
1:32 नीचे सोने की एक खदान है। यह कहानी किसी और की नहीं बल्कि हम में से ज्यादातर लोगों की है। डॉ जोसेफ मर्फी ने जब द पावर ऑन ऑफ योर सबकॉन्शियस माइंड लिखी थी तब उन्होंने इसी बुनियादी सच्चाई को सामने रखा था। आपके भीतर एक ट्रेजर हाउस है एक ऐसा खजाना जो कभी खत्म नहीं होता। आपको सिर्फ अपनी आंखें खोलनी है और उस मानसिक शक्ति को पहचानना है जो आपके हर सपने को हकीकत में बदल सकती है। इस बात को समझने के लिए एक चुंबक यानी मैग्नेट का उदाहरण लेते हैं। विज्ञान हमें बताता है कि अगर आप स्टील के एक टुकड़े को मैग्नेटाइज कर दें तो वह अपने वजन से 12 गुना अधिक भारी चीज को उठा सकता है। लेकिन अगर आप उसी स्टील के टुकड़े से उसका चुंबकीय गुण हटा दें तो वह एक छोटा सा तिनका भी नहीं उठा पाएगा। इंसानों के मामले में भी ठीक ऐसा
2:17 ही होता है। दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। पहले वे जो मैग्नेटाइज्ड होते हैं, वे आत्मविश्वास से भरे होते हैं। उन्हें पता होता है कि वे सफल होने के लिए ही पैदा हुए हैं। जब उनके सामने कोई बड़ी चुनौती आती है, तो वे घबराते नहीं है बल्कि उसका सामना करने के लिए खड़े हो जाते हैं। दूसरे वे लोग होते हैं जो डीमैग्नेटाइज्ड होते हैं। वे हमेशा डर और संदेह से घिरे रहते हैं। जब कोई अफसर उनके दरवाजे पर दस्तक देता है तो वे सोचते हैं कि अगर मैं फेल हो गया तो क्या होगा? अगर लोगों ने मेरा मजाक उड़ाया तो क्या होगा? वे जिंदगी में कभी आगे नहीं बढ़ पाते क्योंकि वे डर के कारण उसी जगह पर रुके रहते हैं। आपको यह तय करना है कि आप किस तरह का इंसान बनना चाहते हैं। सदियों से दुनिया के सबसे महान विचारकों, दार्शनिकों और लीडर्स के पास एक रहस्य था। यह कोई
3:04 जादुई मंत्र नहीं था बल्कि यह उनकी यह समझ थी कि उनका सबकॉन्शियस माइंड कैसे काम करता है। आपका दिमाग दो हिस्सों में बटा है। एक है कॉन्शियस माइंड जिसे हम चेतन मन कहते हैं। और दूसरा है सबकॉन्शियस माइंड यानी अवचेतन मन। आपका कॉन्शियस माइंड तर्क करता है। सोचता है और फैसले लेता है। लेकिन आपका सबकॉन्शियस माइंड कभी तर्क नहीं करता। वह एक उपजाऊ मिट्टी की तरह है। मिट्टी यह नहीं पूछती कि आप उसमें गुलाब का बीज बो रहे हैं या किसी जहरीले पौधे का। आप जो भी बीज बोएंगे, मिट्टी उसे बड़ा कर देगी। ठीक इसी तरह आपके विचार बीज हैं। आपका सबकॉन्शियस माइंड यह नहीं देखता कि आपके विचार अच्छे हैं या बुरे, सच्चे हैं या झूठे। वो बस आपके विचारों को हकीकत में बदलने का काम शुरू कर देता है। अगर आप हर
3:51 दिन यह सोचते हैं कि आप कमजोर हैं तो आपका सबकॉन्शियस माइंड इस बात को सच मान लेगा और आपके जीवन में ऐसी परिस्थितियां पैदा करेगा जिससे आप सच में कमजोर महसूस करेंगे। इसे समझने के लिए एक समुद्री जहाज की कल्पना करें। जहाज का कैप्टन ब्रिज पर खड़ा होता है और वहां से दिशा तय करता है। वह इंजन रूम में बैठे लोगों को निर्देश देता है। इंजन रूम में काम करने वाले लोगों को यह नहीं पता होता कि जहाज कहां जा रहा है। वे बस कैप्टन के आदेशों का पालन करते हैं। वे इंजन की स्पीड बढ़ाते हैं या उसे मोड़ देते हैं। अगर कैप्टन गलत दिशा में जाने का आदेश दे तो जहाज चट्टान से टकरा जाएगा। इंजन रूम के लोग कैप्टन से बहस नहीं करते क्योंकि कैप्टन ही इंचार्ज है। आपके जीवन में आपका कॉन्शियस माइंड वह कैप्टन है। आपकी आंखें, कान और आपके अनुभव
4:36 कैप्टन को जानकारी देते हैं। आपका सबकॉन्शियस माइंड इंजन रूम है। वह कभी आपसे सवाल नहीं करता। आप जो भी सोचते हैं या जिस भी बात पर गहराई से विश्वास करते हैं आपका कैप्टन आपके इंजन रूम को वही आदेश दे देता है। अगर आप बार-बार खुद से कहते हैं कि मैं यह काम नहीं कर सकता तो आपका सबकॉन्शियस माइंड इस आदेश को ग्रहण कर लेता है और यह सुनिश्चित करता है कि आप वाकई उस काम को ना कर पाएं। आधुनिक विज्ञान और न्यूरोसाइंस आज ठीक उसी बात को साबित कर रहे हैं जो डॉ मर्फी ने दशकों पहले बताई थी। आज हम न्यूरोप्लास्टिसिटी के बारे में जानते हैं। विज्ञान यह मान चुका है कि हमारे विचार हमारे दिमाग की फिजिकल संरचना को बदल सकते हैं। हमारे दिमाग में एक सिस्टम होता है जिसे रेटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम या आर एएस कहते हैं। यह एक फिल्टर की तरह काम करता
5:23 है। हर सेकंड आपके आसपास लाखों चीजें हो रही हैं। लेकिन आपका दिमाग उन सभी चीजों को प्रोसेस नहीं कर सकता। आपका आईआरएस केवल उन्हीं चीजों को आपके कॉन्शियस माइंड तक पहुंचने देता है जिन पर आप फोकस करते हैं या जो आपके बिलीफ सिस्टम से मेल खाती है। जब आप अपने सबकॉन्शियस माइंड में यह बात बिठा लेते हैं कि आप सफल हो सकते हैं तो आपका आरएएस उन अवसरों और रास्तों को फिल्टर करके आपके सामने लाने लगता है जो पहले भी वही थे लेकिन आपको दिखाई नहीं दे रहे थे। आपका दिमाग आपकी नई सोच के हिसाब से अपने आप को रिवायर करने लगता है। एक बहुत ही दिलचस्प उदाहरण लेते हैं जो दिखाता है कि सबकॉन्शियस माइंड की प्रोग्रामिंग कैसे किसी इंसान की पूरी वास्तविकता को बदल सकती है। यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जिसने अपना सब कुछ एक स्टार्टअप में लगा दिया था। कुछ सालों तक
6:11 सब कुछ बहुत अच्छा चला। लेकिन फिर मार्केट में बदलाव आया और उसकी कंपनी डूबने लगी। कर्ज बढ़ता जा रहा था और उसे हर तरफ से असफलता नजर आ रही थी। वह तनाव में रहने लगा और उसे रातों को नींद आनी बंद हो गई। उसका हर विचार हार के इर्दगिर्द घूमता था। उसका कैप्टन लगातार उसके इंजन रूम को यह आदेश दे रहा था कि हम बर्बाद हो रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि उसका दिमाग काम करना बंद कर चुका था। वह ऐसे फैसले लेने लगा जिससे नुकसान और भी बढ़ गया। वह पूरी तरह से डीमैग्नेटाइज हो चुका था। फिर एक दिन उसने अपने दिमाग के काम करने के तरीके को समझा। उसे एहसास हुआ कि उसकी असली लड़ाई बाहर मार्केट से नहीं बल्कि उसके अपने दिमाग के अंदर चल रही है। उसने एक बहुत ही सीधा लेकिन शक्तिशाली बदलाव किया। उसने चिंता
6:56 करने और हार के बारे में सोचने की जगह अपने सबकॉन्शियस माइंड को नए आदेश देना शुरू किया। हर रात सोने से ठीक पहले जब दिमाग सबसे ज्यादा ग्रहणशील होता है। वह एक शांत जगह पर बैठता और यह कल्पना करता कि उसकी कंपनी फिर से खड़ी हो गई है। वह अपने बैंक अकाउंट में पैसे आते हुए महसूस करता। वह अपने कर्मचारियों के खुश चेहरों को देखता। वह इस विचार को इतनी गहराई से महसूस करता कि उसका सबकॉन्शियस माइंड इसे सच मान लेता। उसने अपने कैप्टन की आवाज को बदल दिया। शुरुआत में कुछ नहीं बदला। बाहरी दुनिया में अभी भी कर्ज था और परेशानियां थी लेकिन उसके अंदर कुछ बदल चुका था। उसका डर खत्म हो गया था। उसकी जगह एक शांत आत्मविश्वास ने ले ली थी। कुछ ही हफ्तों में उसका नजरिया बदलने लगा। उसे बिजनेस के वे समाधान दिखने लगे जो पहले
7:43 तनाव के कारण नजर नहीं आ रहे थे। उसका आर्य अब हार के संकेतों की जगह अवसरों को फिल्टर कर रहा था। उसने एक नया प्रोडक्ट ल्च करने का रिस्क लिया और केवल डेढ़ साल के अंदर उसने अपनी कंपनी को पूरी तरह से कर्ज मुक्त कर लिया। यह कोई चमत्कार नहीं था। यह मनोविज्ञान और विज्ञान का एक बहुत ही सटीक नियम था जो काम कर रहा था। उस व्यक्ति ने अपने सबकॉन्शियस माइंड की शक्ति का इस्तेमाल किया। आपका सबकॉन्शियस माइंड एक अथाह सागर की तरह है जिसमें हर समस्या का समाधान मौजूद है। जब आप अपने कॉन्शियस माइंड से किसी समस्या पर विचार करते करते थक जाते हैं तो उसे अपने सबकॉन्शियस माइंड को सौंप दें। उसे यह विश्वास दिलाएं कि समाधान मिल रहा है। आपका सबकॉन्शियस माइंड आपके शरीर की हर एक प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। आपके दिल
8:29 की धड़कन, आपके फेफड़ों का फैलना और सिकुड़ना, आपका पाचन यह सब आपका सबकॉन्शियस माइंड ही चलाता है। जब आप सो रहे होते हैं, तब भी यह काम कर रहा होता है। यह कभी थकता नहीं है और कभी आराम नहीं करता। अगर यह आपके शरीर को बिना आपके सोचे चला सकता है, तो क्या यह आपके जीवन की समस्याओं को नहीं सुलझा सकता? बिल्कुल सुलझा सकता है। बशर्ते आप इसे सही निर्देश दें। हर दिन की जिंदगी में हम इस शक्ति का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं? इस पर विचार करें। मान लीजिए आपको एक बहुत महत्वपूर्ण नौकरी का इंटरव्यू देने जाना है। एक डिमैग्नेटाइज्ड इंसान इंटरव्यू से एक रात पहले क्या करेगा? वह बिस्तर पर लेट कर उन सारी चीजों के बारे में सोचेगा जो गलत हो सकती है। वह सोचेगा कि अगर मुझे सवालों के जवाब नहीं आए तो क्या होगा? अगर मैं
9:14 इंटरव्यू लेने वाले को पसंद नहीं आया तो क्या होगा? वह अपने दिमाग में असफलता की एक फिल्म चला रहा है। उसका कैप्टन इंजन रूम को हार का संदेश भेज रहा है। जब वह अगले दिन इंटरव्यू देने जाएगा तो उसका सबकॉन्शियस माइंड उसी घबराहट और डर को हकीकत में बदल देगा जो उसने एक रात पहले महसूस की थी। उसके हाथ कांपेंगे। वह सही जवाब जानते हुए भी उन्हें बोल नहीं पाएगा। अब देखते हैं कि एक मैग्नेटाइज्ड इंसान क्या करेगा। वह जानता है कि उसका सबकॉन्शियस माइंड कैसे काम करता है। सोने से ठीक पहले जब उसका शरीर शांत होगा, वह अपनी आंखें बंद करेगा और एक बिल्कुल अलग फिल्म चलाएगा। वो कल्पना करेगा कि इंटरव्यू बहुत शानदार जा रहा है। वह इंटरव्यू लेने वाले की मुस्कान को देखेगा। वो खुद को पूरे आत्मविश्वास के साथ जवाब देते हुए सुनेगा। वह उस खुशी को
10:02 महसूस करेगा जो उसे नौकरी मिलने के बाद मिलेगी। वह इस भावना को अपने अंदर तब तक महसूस करेगा जब तक कि उसे नींद नहीं आ जाती। उसने अपने इंजन रूम में सफलता का बीज बो दिया है। अगले दिन जब वह इंटरव्यू रूम में कदम रखेगा तो उसका दिमाग शांत होगा। उसका आरएएस उसे सही शब्दों को चुनने में मदद करेगा। उसका आत्मविश्वास सामने वाले को प्रभावित करेगा। दोनों लोगों के पास समान योग्यता हो सकती है। लेकिन उनके सबकॉन्शियस माइंड की प्रोग्रामिंग ने उनके परिणाम को पूरी तरह से बदल दिया। आपका सबकॉन्शियस माइंड केवल आपके करियर या सफलता को ही प्रभावित नहीं करता। बल्कि यह आपके शरीर और आपके स्वास्थ्य को भी नियंत्रित करता है। मेडिकल साइंस में आज प्लसो इफेक्ट पर बहुत रिसर्च हो रही है। यह प्लसबो इफेक्ट आखिर क्या है? यह पूरी
10:47 तरह से सबकॉन्शियस माइंड की शक्ति का प्रमाण है। कई बार मरीजों को एक साधारण चीनी की गोली यह कह कर दी जाती है कि यह एक बहुत ताकतवर और नई दवा है जो उनकी बीमारी को तुरंत ठीक कर देगी। मरीज इस बात पर पूरा विश्वास कर लेता है। उसका कैप्टन उसके इंजन रूम को यह सख्त आदेश देता है कि शरीर में दवा आ चुकी है और अब शरीर को ठीक होना है। और हैरानी की बात यह होती है कि मरीज का शरीर सचमुच ठीक होने लगता है। उसका दिमाग शरीर में उन रसायनों और हार्मोंस को रिलीज करने लगता है जो असली दवा खाने पर रिलीज होते हैं। यह कोई जादू नहीं है। यह उस खजाने की शक्ति है जो हर इंसान के अंदर मौजूद है। जब आपका सबकॉन्शियस माइंड किसी बात को सच मान लेता है तो वह उसे हकीकत में बदलने के लिए शरीर के हर सेल को आदेश दे सकता है। इसलिए यह
11:33 बहुत जरूरी है कि आप खुद से क्या कहते हैं। आपकी आंतरिक बातचीत या सेल्फ टॉक आपके भविष्य की रूपरेखा तैयार कर रही है। बहुत से लोग अनजाने में खुद को श्राप देते रहते हैं। वे कहते हैं कि मेरी तो किस्मत ही खराब है या मैं तो हमेशा बीमार रहता हूं या पैसा मेरे पास टिकता ही नहीं है। आपको आज से ही इस तरह की भाषा को पूरी तरह से छोड़ना होगा। आपका सबकॉन्शियस माइंड एक मजाक और सच में फर्क नहीं कर सकता। वह आपकी हर बात को गंभीरता से लेता है। जब आप कहते हैं कि मैं यह काम कभी नहीं सीख पाऊंगा तो आपका दिमाग तुरंत आपके लिए उस काम को असंभव बना देता है। इसके बजाय आपको अपने दिमाग को यह बताना होगा कि आप क्या चाहते हैं। आपको कहना होगा कि मैं हर दिन बेहतर हो रहा हूं और मैं अपनी मनचाही जिंदगी का निर्माण कर रहा हूं। यह खजाना
12:20 किसी बाहर के व्यक्ति के पास नहीं है जिसे आपको खोजना पड़े। यह खजाना आपके अपने अंदर है। आपकी हर समस्या का समाधान, आपकी हर बीमारी का इलाज और आपकी हर आर्थिक परेशानी का हल आपके सबकॉन्शियस माइंड की गहराई में मौजूद है। बस जरूरत है तो इस शक्ति को पहचानने की और इसे सही तरीके से इस्तेमाल करने की। जब आप इस बात को पूरी तरह से समझ लेंगे कि आप अपने विचारों के मालिक हैं और आपका दिमाग आपका सबसे वफादार नौकर है तो आपके जीवन में चमत्कार होने शुरू हो जाएंगे। आप जो भी बनना चाहते हैं जो भी पाना चाहते हैं वह सब कुछ आपके लिए संभव है। आपको बस अपनी सोच के उस दरवाजे को खोलना है जिसके पीछे असीमित संभावनाएं आपका इंतजार कर रही हैं। यह सिर्फ एक शुरुआत है। यह समझना कि आपके पास एक खजाना है। पहला कदम है। लेकिन इस खजाने का ताला
13:08 कैसे खुलता है? यह मशीनरी असल में काम कैसे करती है और आप आज से ही इसे अपने पक्ष में कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं यह जानना पूरी तस्वीर को बदल देता है। चैप्टर टू हाउ योर ओन माइंड वर्क्स। कल्पना कीजिए कि आपके पास एक बहुत ही उपजाऊ और सुंदर जमीन का टुकड़ा है। उस मिट्टी की खासियत यह है कि उसमें आप जो भी बीज बोएंगे, वह पूरी ताकत के साथ उसे बड़ा कर देगी। मिट्टी कभी आपसे यह नहीं पूछेगी कि आपने उसमें एक मीठे फल का बीज डाला है या किसी जहरीले पौधे का? उसका काम सिर्फ उस बीज को पोषण देना और उसे एक वास्तविक आकार देना है। आपका दिमाग बिल्कुल इसी तरह काम करता है। डॉ जोसेफ मर्फी ने जब दिमाग के काम करने के तरीके को समझाया तो उन्होंने इस बात पर बहुत जोर दिया कि आपका
13:53 दिमाग एक है लेकिन इसके दो अलग-अलग हिस्से या कार्यप्रणालियां हैं। एक है कॉन्शियस माइंड। यानी आपका चेतन मन और दूसरा है सबकॉन्शियस माइंड यानी आपका अवचेतन मन। आपका कॉन्शियस माइंड वह माली है जो बीज बोता है। यह आपके दिमाग का वह हिस्सा है जो चीजों को देखता है, परखता है, तर्क करता है और निर्णय लेता है। आप दिन भर क्या सोचते हैं? यह आपका कॉन्शियस माइंड तय करता है। दूसरी तरफ आपका सबकॉन्शियस माइंड वो उपजाऊ मिट्टी है। यह कभी कोई सवाल नहीं पूछता। यह सही और गलत, सच और झूठ के बीच कोई फर्क नहीं जानता। यह बस उन विचारों को ग्रहण कर लेता है जो आपका कॉन्शियस माइंड इसे सौंपता है। अगर आप अपने कॉन्शस माइंड से लगातार डर चिंता और संदेह के बीज बो रहे हैं तो आपका
14:39 सबकॉन्शियस माइंड उस मिट्टी की तरह उन बीजों को स्वीकार कर लेगा और आपके जीवन में ऐसी परिस्थितियां पैदा करेगा जो आपके डर को सच साबित कर दे। इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए मनोविज्ञान के एक बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्धांत को समझना होगा जिसे सजेशन या सुझाव कहा जाता है। सजेशन का मतलब है किसी विचार को दिमाग में डालना और उसे स्वीकार करवा लेना। दुनिया में किसी भी इंसान के विचार में इतनी ताकत नहीं है कि वह आपके सबकॉन्शियस माइंड में सीधे प्रवेश कर सके जब तक कि आपका कॉन्शियस माइंड उसे अनुमति ना दे। आपका कॉन्शियस माइंड एक वॉचमैन यानी पहरेदार की तरह है। इस पहरेदार का सबसे अहम काम आपके सबकॉन्शियस माइंड के दरवाजे की रक्षा करना है। हम बचपन से लेकर आज तक लगातार सजेशंस
15:27 के बीच रहते हैं। अगर आप ध्यान से सोचेंगे तो पाएंगे कि आपकी बहुत सी मान्यताएं असल में आपकी अपनी है ही नहीं। वे आपको समाज, माता-पिता, शिक्षकों या मीडिया द्वारा दी गई है। तुम यह काम नहीं कर सकते। तुम कभी अमीर नहीं बन पाओगे। जिंदगी बहुत मुश्किल है। तुम उस लायक नहीं हो। यह सारे नकारात्मक सुझाव हम हर दिन सुनते हैं। जब हम छोटे होते हैं तो हमारे मन का पहरेदार मजबूत नहीं होता। इसलिए यह बातें सीधे हमारे सबकॉन्शियस माइंड में चली जाती हैं और हमारी गहरी प्रोग्रामिंग बन जाती है। इसे हेट्रो सजेशन कहा जाता है। यानी दूसरों के द्वारा दिए गए सुझाव। आज की आधुनिक दुनिया में यह खतरा बहुत ज्यादा बढ़ गया है। हर दिन नर्स न्यूज़ चैनल्स, सोशल मीडिया और विज्ञापन आपको यह महसूस
16:14 कराने की कोशिश करते हैं कि दुनिया में सब कुछ गलत हो रहा है या आप में कोई कमी है। अगर आपका पहरेदार सो रहा है तो यह सारे नकारात्मक विचार चुपचाप आपके दिमाग की गहरी परतों में समा जाते हैं। और जैसा कि न्यूरो साइंस आज साबित कर चुका है। आप जिन चीजों पर लगातार फोकस करते हैं, आपका दिमाग उसी के अनुसार अपने न्यूरॉन्स को रिवायर कर लेता है। आपका दिमाग यह मान लेता है कि दुनिया एक खतरनाक जगह है या आप सफलता के लायक नहीं है। आइए इसे एक बहुत ही वास्तविक और आधुनिक उदाहरण से समझते हैं जो दिखाता है कि सजेशन किसी इंसान की पूरी जिंदगी कैसे बदल सकता है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो कॉर्पोरेट दुनिया में बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा था। उसकी परफॉर्मेंस बेहतरीन थी और उसे जल्द ही
17:01 वाइस प्रेसिडेंट की पोस्ट मिलने वाली थी। एक दिन उसके ऑफिस में एक नया सीनियर मैनेजर आया। उस मैनेजर को इस व्यक्ति से किसी बात पर जलन थी। उसने एक बहुत ही सूक्ष्म खेल खेला। उसने लगातार इस व्यक्ति को नकारात्मक सजेशन देना शुरू किया। मीटिंग्स में वह उससे कहता कि तुम्हारे आइडियाज अब पहले जैसे क्रिएटिव नहीं रहे। तुम्हारी टीम तुमसे खुश नहीं है। तुम शायद बड़ी जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार नहीं हो। उस व्यक्ति का काम बहुत शानदार था। लेकिन उसने एक बहुत बड़ी गलती की। उसने अपने मन के दरवाजे पर खड़े पहरेदार को हटा दिया। उसने उस सीनियर मैनेजर की बातों को सच मान लिया। जैसे ही उसके कॉन्शियस माइंड ने उस विचार को स्वीकार किया, वह विचार सीधे उसके सबकॉन्शियस माइंड में चला गया। अब बदलाव भीतर से शुरू
17:47 हुआ। उसका सबकॉन्शियस माइंड यह साबित करने में लग गया कि वह सच में काबिल नहीं है। जब वह अगली बार मीटिंग में बोलने खड़ा हुआ तो उसका आत्मविश्वास हिल गया। वह सही शब्द भूलने लगा। वह फैसले लेने में डरने लगा क्योंकि उसे लगने लगा कि वह कोई गलती कर देगा। उसकी परफॉर्मेंस सच में गिरने लगी और कुछ ही महीनों में उसका प्रमोशन रोक दिया गया। इस कहानी में उस व्यक्ति को किसने हराया? उस सीनियर मैनेजर ने नहीं उस व्यक्ति के अपने सबकॉन्शियस माइंड ने उसे हराया क्योंकि उसके कॉन्शियस माइंड ने एक झूठे विचार को अंदर आने दिया। डोमर्फी सिखाते हैं कि किसी भी दूसरे व्यक्ति के सुझाव में आपको नुकसान पहुंचाने की कोई ताकत नहीं होती। वह ताकत तभी काम करती है जब आप उस विचार पर विश्वास कर लेते हैं। अगर उस व्यक्ति ने पहले ही दिन मन में यह
18:34 सोच लिया होता कि यह मैनेजर सिर्फ अपनी जलन निकाल रहा है। मेरे काम से इसकी बातों का कोई लेना देना नहीं है तो वह सुझाव वहीं खत्म हो जाता। अब देखते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया को अपने फायदे के लिए कैसे इस्तेमाल किया जाए। इसके लिए आपको ऑटो सजेशन का इस्तेमाल करना होगा। ऑटो सजेशन का मतलब है खुद को लगातार एक निश्चित और सकारात्मक सुझाव देना। यह आपके पुराने और नकारात्मक बिलीफ सिस्टम्स को तोड़ने का सबसे कारगर तरीका है। एक और उदाहरण लेते हैं जो बताता है कि कैसे ऑटो सजेशन एक इंसान के दिमाग की पूरी वायरिंग बदल सकता है। एक युवा महिला जो एक बहुत ही टैलेंटेड म्यूजिशियन थी उसे स्टेज पर परफॉर्म करने से बहुत डर लगता था। जब भी वह मंच पर जाती उसका गला सूखने लगता, उंगलियां कांपने
19:21 लगती और वह कई बार धुन भूल जाती। वह अपनी कला में माहिर थी। लेकिन उसका सबकॉन्शियस माइंड उसे यह महसूस करा रहा था कि स्टेज एक खतरनाक जगह है। उसने सालों तक खुद को यह ऑटो सजेशन दिया था कि मैं ऑडियंस के सामने परफॉर्म नहीं कर सकती। लोग मेरा मजाक उड़ाएंगे। जब उसे समझ में आया कि उसका दिमाग कैसे काम करता है। तो उसने एक नई रणनीति अपनाई। उसने इस बात को पहचाना कि वह अपने ही पहरेदार को गलत निर्देश दे रही थी। उसने हर दिन तीन बार एक शांत कमरे में बैठकर अपने दिमाग को रिप्रोग्राम करना शुरू किया। वह अपनी आंखें बंद कर दी और एक गहरी सांस लेकर खुद को बिल्कुल रिलैक्स कर लेती। फिर वह खुद से कहती, "मैं बहुत खूबसूरती से गाती हूं। मैं स्टेज पर पूरी तरह से शांत और आत्मविश्वासी हूं। मेरा
20:08 संगीत लोगों को खुशी देता है। उसने इस विचार को केवल शब्दों की तरह नहीं बोला बल्कि उसने उस खुशी और आत्मविश्वास को महसूस किया जो उसे एक बेहतरीन परफॉर्मेंस के बाद मिलती। शुरुआत में उसके कॉन्शियस माइंड ने इस नई बात को खारिज करने की कोशिश की क्योंकि उसे पुरानी घबराहट की आदत थी। लेकिन उसने यह प्रक्रिया नहीं छोड़ी। वह लगातार उस उपजाऊ मिट्टी में नए बीज बोती रही। कुछ ही हफ्तों में चमत्कार होने लगा। जब वह अगली बार स्टेज पर गई तो डर की जगह एक अजीब सी शांति थी। उसका सबकॉन्शियस माइंड अब पुरानी कैसेट प्ले नहीं कर रहा था। उसने नई रिकॉर्डिंग को अपना लिया था। उसने अपनी जिंदगी की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस दी और उसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
20:53 यहां विज्ञान भी पूरी तरह से डोमर्फी के सिद्धांतों का समर्थन करता है। जब वह महिला घबराहट के बारे में सोचती थी तो उसका दिमाग खतरे के सिग्नल भेजता था और शरीर में कॉर्टिसोल और एड्रनलाइन जैसे स्ट्रेस हार्मोन रिलीज होते थे जिससे उसके हाथ कांपते थे। लेकिन जब उसने ऑटो सजेशन के जरिए अपने दिमाग को शांत किया तो उसने अपने नर्वस सिस्टम को यह संदेश दिया कि वह सुरक्षित है। उसका दिमाग अब डर की जगह फोकस और फ्लो स्टेट में चला गया। जब स्वास्थ्य की बात आती है तो आपका सबकॉन्शियस माइंड कैसे काम करता है। इसे समझना बहुत जरूरी है। अगर कोई व्यक्ति हर दिन किसी नई बीमारी के बारे में पढ़ता है और मन ही मन डरने लगता है कि कहीं उसे भी यह बीमारी ना हो जाए तो वह अनजाने में
21:39 अपने वॉचमैन को सुला रहा है। वह उस बीमारी के लक्षणों पर इतना फोकस करने लगता है कि उसका दिमाग शरीर में तनाव पैदा कर देता है। डोमर्फी ने बताया कि मेडिकल साइंस भी इस बात को मानता है कि हमारी बहुत सी शारीरिक समस्याएं साइकोसोमेटिक होती हैं। यानी उनकी शुरुआत हमारे दिमाग से होती है और फिर वे शरीर में प्रकट होती हैं। जब आप लगातार खुद को बीमार महसूस करते हैं तो आपका सबकॉन्शियस माइंड आपके इम्यून सिस्टम को कमजोर कर देता है। इसके विपरीत जब आप हर दिन खुद को यह याद दिलाते हैं कि आपका शरीर खुद को हील करने में सक्षम है तो आपका दिमाग शरीर को मजबूत बनाने वाले रसायनों को रिलीज करता है। एक और आम जगह जहां लोग अपने दिमाग के काम करने के तरीके को नहीं समझ पाते वह है उनके रिश्ते। मान
22:25 लीजिए किसी इंसान का एक पुराना रिश्ता टूट गया था। अब जब वह किसी नए इंसान से मिलता है तो उसका कॉन्शियस माइंड लगातार पुराने डर को सामने लाता है। वह सोचता है कि यह इंसान भी मुझे धोखा देगा। वह हर छोटी बात पर शक करने लगता है। उसका सबकॉन्शियस माइंड उस डर को एक निर्देश की तरह लेता है और उसके व्यवहार को इस तरह बदल देता है कि वह नया रिश्ता सच में खराब होने लगता है। वह इंसान सोचता है कि उसने सही अंदाजा लगाया था। लेकिन असल में उसने खुद अपने नकारात्मक सजेशन से उस रिश्ते को बर्बाद किया। अगर वह अपने पहरेदार का सही इस्तेमाल करता और खुद को यह समझाता कि हर इंसान अलग है और वह एक खूबसूरत रिश्ते के लायक है तो उसका सबकॉन्शियस माइंड उस नए
23:11 रिश्ते को पनपने के लिए सही भावनाएं और व्यवहार पैदा करता। यह समझना बहुत ही मुक्तिदायक है कि दुनिया की कोई भी ताकत, कोई भी इंसान या कोई भी परिस्थिति आपको तब तक दुखी या असफल नहीं बना सकती जब तक आपका अपना दिमाग उसे स्वीकार ना कर ले। आप अपने विचारों के सम्राट हैं। आपका मन एक महल है और आप यह तय करते हैं कि इस महल में कौन रहेगा। जब भी कोई नकारात्मक विचार आपके दरवाजे पर आए तो उसे एक मेहमान की तरह ना देखें जिसे आपको अंदर बुलाना है। उसे एक घुसपैठिए की तरह देखें जिसे आपको बाहर निकालना है। अगर आप आज से ही एक छोटा सा अभ्यास शुरू करें तो आप कुछ ही दिनों में अपने सोचने के तरीके में एक बड़ा बदलाव देखेंगे। रात को सोने से पहले का समय और
23:59 सुबह उठने के तुरंत बाद का समय आपके सबकॉन्शियस माइंड को प्रोग्राम करने के लिए सबसे शक्तिशाली होता है। इन दोनों समय पर आपका वॉचमैन थोड़ा थका हुआ होता है और आपके मन के दरवाजे खुले होते हैं। इस समय कभी भी अपनी समस्याओं, कर्ज या चिंताओं के बारे में ना सोें। इसके बजाय इस समय को अपने जीवन के सबसे बेहतरीन विचारों से भर दें। अपने मन में उस जिंदगी की तस्वीर बनाएं जो आप जीना चाहते हैं। उस शांति और सफलता को महसूस करें। जब आप हर रात इस भावना के साथ सोएंगे तो आपका सबकॉन्शियस माइंड रात भर उन विचारों पर काम करेगा और सुबह आपको एक नई ऊर्जा और नए समाधानों के साथ जगाएगा। आपका दिमाग आपके लिए काम करने के लिए ही बना है। आपके खिलाफ नहीं। इसे सही निर्देश देना शुरू करें। इसे बताएं कि
24:46 आप क्या चाहते हैं कि आप किस चीज से डरते हैं। जिस दिन आप अपने कॉन्शियस माइंड की शक्ति को पहचान कर अपने सबकॉन्शियस माइंड की असीम क्षमता को सही दिशा देना सीख जाएंगे। उस दिन आपके लिए कुछ भी असंभव नहीं रहेगा। यह जानना कि आपके दिमाग के दो हिस्से कैसे काम करते हैं। आपको उस असली जादू के लिए तैयार करता है जो आपके भीतर हमेशा से मौजूद है। और वह जादू तब शुरू होता है जब आपका सबकॉन्शियस माइंड पूरी तरह से जागृत होकर आपके लिए काम करना शुरू करता है। चैप्टर थ्री द मिरेकल वर्किंग पावर ऑफ योर सबकॉन्शियस। जब आप गहरी नींद में होते हैं तब भी आपका दिल धड़कता रहता है। आपके फेफड़े लगातार हवा अंदर और बाहर खींचते
25:31 रहते हैं और आपका पाचन तंत्र आपके रात के खाने को ऊर्जा में बदल रहा होता है। आपने कभी इस बात पर ध्यान नहीं दिया होगा कि इन सारी जटिल प्रक्रियाओं को चलाने के लिए आपको कभी कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। अगर इन सब कामों की जिम्मेदारी आपके कॉन्शियस माइंड को दे दी जाए तो शायद आप एक दिन भी जिंदा ना रह सकें क्योंकि आप भूल जाएंगे कि अगली सांस कब लेनी है या दिल को धड़काना है। यह आपके भीतर मौजूद एक ऐसी रहस्यमई और चमत्कारिक शक्ति है जो कभी नहीं सोती। डॉ जोसेफ मर्फी ने इसे आपके सबकॉन्शियस माइंड की चमत्कारिक शक्ति कहा है। यह वह बुद्धिमत्ता है जिसने आपके शरीर का निर्माण किया है और जो हर पल आपके शरीर को जिंदा रखने का काम कर रही है। विज्ञान हमें बताता है कि आपका शरीर हर 11 महीने में पूरी तरह से नया हो जाता है। आपके सेल्स लगातार मर रहे हैं और उनकी जगह नए
26:19 सेल्स जन्म ले रहे हैं। आपका सबकॉन्शियस माइंड आपके शरीर का निर्माता है। इसे पता है कि एक छोटे से बीज से एक पूरा इंसान कैसे बनाना है। जब आपकी उंगली पर कोई कट लग जाता है तो आप घबराते नहीं है। आप बैंडेड लगाते हैं और भूल जाते हैं। आपको पता होता है कि आपके शरीर के अंदर की बुद्धिमत्ता खून को रोक देगी। सफेद रक्त कोशिकाओं को भेजकर इनफेक्शन को रोकेगी और नई त्वचा बना देगी। यह हीलिंग की प्रक्रिया एक चमत्कार से कम नहीं है। लेकिन परेशानी तब शुरू होती है जब आपका कॉन्शियस माइंड इस प्राकृतिक प्रक्रिया में दखल अंदाजी करने लगता है। जब आप डर, चिंता और तनाव से घिरे होते हैं तो आप अपने सबकॉन्शियस माइंड के काम में रुकावट डालते हैं। कल्पना कीजिए कि एक
27:04 बहुत ही बेहतरीन कारीगर एक सुंदर घर बना रहा है। लेकिन आप हर 5 मिनट में उसके पास जाकर चिल्लाते हैं कि ईंटें कमजोर हैं। सीमेंट खराब है और यह घर कोई नहीं बन पाएगा। वह कारीगर घबरा जाएगा और उसका काम खराब हो जाएगा। ठीक यही काम हम अपने शरीर के साथ करते हैं। जब हम कहते हैं कि मेरी बीमारी कभी ठीक नहीं होगी या मैं हमेशा कमजोर महसूस करता हूं तो हमारा कॉन्शियस माइंड उन नकारात्मक विचारों को हमारे सबकॉन्शियस माइंड तक पहुंचा देता है। नतीजा यह होता है कि हीलिंग की वह प्राकृतिक प्रक्रिया धीमी हो जाती है या रुक जाती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में साइकोन्यूरो इम्यूनोलॉजी का अध्ययन हमें ठीक यही बताता है। आपके विचार सीधे आपके इम्यून सिस्टम को प्रभावित करते हैं। तनाव से भरे विचार कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ाते हैं जो आपकी
27:52 बीमारियों से लड़ने की क्षमता को कम कर देता है। इस चमत्कारिक शक्ति को गहराई से समझने के लिए एक युवा एथलीट की कहानी को देखते हैं जो एक प्रोफेशनल जिम्नास्ट थी। एक इंटरनेशनल टूर्नामेंट से कुछ महीने पहले प्रैक्टिस के दौरान उसकी रीड की हड्डी में गंभीर चोट आ गई। डॉक्टरों ने कहा कि अब उसका दोबारा जिम्नास्टिक्स करना लगभग असंभव है। शुरुआत में वह पूरी तरह से टूट गई। उसका कॉन्शियस माइंड लगातार उसे डरा रहा था कि उसका करियर खत्म हो गया है और वह जीवन भर दर्द में रहेगी। दर्द सच में बढ़ने लगा क्योंकि उसका दिमाग खतरे के सिग्नल भेज रहा था। लेकिन कुछ दिनों बाद उसने अपने दिमाग की शक्ति को इस्तेमाल करने का फैसला किया। उसे समझ आ गया कि जिस शक्ति ने उसकी हड्डियों और मांसपेशियों को बनाया है, वह उन्हें रिपेयर भी कर सकती है। बशर्ते वह डरना बंद कर दे। उसने एक नई
28:39 मानसिक प्रक्रिया शुरू की। हर रात सोने से पहले वह अपने शरीर को पूरी तरह से रिलैक्स करती। वह दर्द पर ध्यान देने की बजाय अपनी रीड की हड्डी के पूरी तरह से स्वस्थ और मजबूत होने की कल्पना करती। वह महसूस करती कि वह फिर से उछल कूद रही है और उसका शरीर एकदम सही आकार में है। वह अपने सबकॉन्शियस माइंड को यह साफ संदेश दे रही थी कि हीलिंग हो रही है। उसने अपने कॉन्शियस माइंड की दखल अंदाजी को पूरी तरह से बंद कर दिया। उसने खुद से यह कहना छोड़ दिया कि डॉक्टर ने क्या कहा था। धीरे-धीरे उसके शरीर ने इस नए आदेश को स्वीकार कर लिया। उसका तनाव कम हुआ जिससे उसके शरीर का ब्लड फ्लो बेहतर हो गया। छ महीने बाद जब डॉक्टरों ने दोबारा उसके एक्सरे देखे तो वे हैरान रह गए। उसकी हड्डी और टिश्यू उस
29:26 गति से जुड़ गए थे जिसे मेडिकल साइंस में असाधारण माना जाता है। उसने अपनी उस आंतरिक शक्ति का इस्तेमाल किया जो किसी भी बाहरी दवा से ज्यादा शक्तिशाली है। यह चमत्कारिक शक्ति सिर्फ आपके शरीर को हील करने तक सीमित नहीं है। यह आपके जीवन की सबसे उलझी हुई समस्याओं को सुलझाने की क्षमता भी रखती है। आपका सबकॉन्शियस माइंड एक विशाल सुपर कंप्यूटर की तरह है जिसके पास आपके हर अनुभव, हर याद और हर उस जानकारी का एक्सेस है जो आपने कभी सुनी या देखी है। जब आप अपने कॉन्शियस माइंड से किसी समस्या का समाधान खोजने की कोशिश करते हैं तो आप अक्सर एक सीमा पर आकर रुक जाते हैं। आप तनाव में आ जाते हैं और आपका दिमाग काम करना बंद कर देता है। ऐसे समय में सबसे बेहतरीन तरीका यह है कि आप
30:13 समस्या से अपना ध्यान हटा लें और उसे अपने सबकॉन्शियस माइंड को सौंप दें। सिलिकॉन वैली के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर का उदाहरण इस बात को बहुत स्पष्ट रूप से समझाता है। वह एक बहुत ही जटिल एल्गोरिदम पर काम कर रहा था जो एक नए डाटा सिक्योरिटी सिस्टम के लिए जरूरी था। उसने लगातार तीन हफ्तों तक दिनरा उस कोड को क्रैक करने की कोशिश की। उसने हर संभव तर्क लगाया। लेकिन हर बार वह एक जगह आकर अटक जाता। उसका कॉन्शियस माइंड बुरी तरह से थक चुका था और वह हार मानने वाला था। उसे लगने लगा था कि यह प्रोजेक्ट फेल हो जाएगा। एक रात उसने फैसला किया कि वह अब इस बारे में और नहीं सोचेगा। उसने अपना लैपटॉप बंद किया और बिस्तर पर लेट गया। सोने से ठीक पहले उसने अपने दिमाग को शांत किया और खुद से कहा कि
30:59 मेरे सबकॉन्शियस माइंड के पास इस समस्या का सही जवाब मौजूद है। उसने कल्पना की कि उसने वह कोड सफलता से लिख लिया है और उसका सॉफ्टवेयर बिना किसी रुकावट के काम कर रहा है। वह इस संतुष्टि की भावना के साथ सो गया। रात को लगभग 3:00 बजे उसकी नींद अचानक खुली। उसके दिमाग में विचारों की कोई उलझन नहीं थी बल्कि एक बहुत ही साफ गणितीय समीकरण था। वह तुरंत उठा और उसने वह कोड अपने लैपटॉप पर टाइप कर दिया। जब उसने प्रोग्राम रन किया तो वह बिल्कुल सही काम कर रहा था। जो समाधान उसका कॉन्शियस माइंड तीन हफ्ते की कड़ी मेहनत के बाद भी नहीं खोज पाया था। वह उसके सबकॉन्शियस माइंड ने उसे नींद की गहराई से निकाल कर दे दिया। यह कैसे हुआ? यह कोई रहस्यमई जादू नहीं था। जब वह इंजीनियर तनाव में था
31:45 तो उसका कॉन्शियस माइंड उसके दिमाग के उन हिस्सों को ब्लॉक कर रहा था जहां रचनात्मकता और गहरे समाधान मौजूद होते हैं। विज्ञान में इसे बीटा ब्रेन वेव स्टेट कहते हैं। जहां हम बहुत ज्यादा तर्क करते हैं और तनाव में होते हैं। लेकिन जब वह सोने गया और उसने समस्या को अपने सबकॉन्शियस माइंड को सौंप दिया। तो उसका दिमाग थीटा और डेल्टा स्टेट में चला गया। इन गहरी अवस्थाओं में आपका दिमाग उन सभी बिंदुओं को जोड़ सकता है जिन्हें आपका चेतन मन नहीं देख पाता। आपके सबकॉन्शियस माइंड के पास दुनिया की हर किताब, हर ज्ञान और हर समाधान तक पहुंचने की क्षमता है। आपको बस उस पर भरोसा करना सीखना होगा। अक्सर लोग यह गलती करते हैं कि वे अपने दिमाग से जबरदस्ती काम करवाने की कोशिश करते हैं। वे बहुत ज्यादा मानसिक दबाव
32:30 डालते हैं। लेकिन आपका सबकॉन्शियस माइंड दबाव में काम नहीं करता। मानसिक तनाव हमेशा आपके अवचेतन मन की कार्यप्रणाली को रोक देता है। अगर आप लगातार सोचते हैं कि मैं इस समस्या को कैसे सुलझाऊंगा, यह कैसे होगा? तो आप असल में अपने दिमाग को यह बता रहे हैं कि आपके पास समाधान नहीं है। आपका दिमाग केवल आपकी भावनाओं पर प्रतिक्रिया करता है। जब आप शांत होते हैं और पूर्ण विश्वास में होते हैं, तभी आपका सबकॉन्शियस माइंड सबसे तेजी से काम करता है। इसके अलावा आपका सबकॉन्शियस माइंड हमेशा आपको सीधे जवाब नहीं देता। कई बार यह आपको आपकी इंट्यूशन या अंतर ज्ञान के माध्यम से रास्ता दिखाता है। आपने कभी महसूस किया होगा कि अचानक आपको किसी पुराने दोस्त को कॉल करने का मन करता है और बात करने पर पता चलता है कि उसके पास
33:17 आपकी किसी समस्या का समाधान था या आप अचानक कोई किताब पढ़ने लगते हैं और उसके एक पन्ने पर आपको अपने सवाल का जवाब मिल जाता है। यह कोई इत्तेफाक नहीं होते। यह आपका सबकॉन्शियस माइंड है जो आपको सही दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रहा है। आपको बस इन सूक्ष्म संकेतों को पहचानना और उन पर भरोसा करना सीखना है। इस शक्ति का लाभ उठाने के लिए डोमर्फी एक बहुत ही सरल लेकिन शक्तिशाली तकनीक बताते हैं। जिसे आप आज रात से ही शुरू कर सकते हैं। इसे स्लीप प्रोग्रामिंग कहा जाता है। आपका सबकॉन्शियस माइंड तब सबसे ज्यादा ग्रहणशील होता है जब आप नींद की आगोश में जा रहे होते हैं। इस समय आपका तर्क करने वाला कॉन्शियस माइंड सो रहा होता है। कभी भी अपनी परेशानियों, चिंताओं या अगले दिन के तनाव को लेकर बिस्तर पर ना जाए। अगर आप
34:04 ऐसा करते हैं तो आप अपने भीतर बैठे उस कारीगर को रात भर के लिए नकारात्मक काम सौंप रहे हैं। वह रात भर आपके तनाव को बढ़ाने वाले रसायनों का निर्माण करेगा और सुबह आप थके हुए उठेंगे। इसके बजाय जब आप सोने जाएं तो अपने शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें। अगर आपको कोई शारीरिक समस्या है तो अपने सबकॉन्शियस माइंड से बात करें। उसे आदेश नहीं बल्कि धन्यवाद दें। महसूस करें कि वह शक्ति आपके शरीर के एक-एक सेल को हील कर रही है। अगर आपको कोई वित्तीय या करियर से जुड़ी समस्या है तो उस समस्या के समाधान के बारे में सोें। खुद को उस स्थिति में देखें जहां वह समस्या सुलझ चुकी है। उस शांति और खुशी को अपने पूरे शरीर में महसूस करें और उस भावना के साथ नींद में प्रवेश करें। आपका सबकॉन्शियस
34:49 माइंड उस विचार को एक ब्लूप्रिंट की तरह ले लेगा और रात भर उस पर काम करेगा। जब आप सुबह उठेंगे तो आपके पास एक नई ऊर्जा होगी और हो सकता है कि आपको दिन के दौरान अचानक वह समाधान मिल जाए जिसकी आपको तलाश थी। आपको यह समझना होगा कि आपको अपने सबकॉन्शियस माइंड को यह नहीं बताना है कि किसी काम को कैसे करना है। आपको बस उसे यह बताना है कि क्या करना है। आपको परिणाम पर फोकस करना है। प्रक्रिया पर नहीं। जब आप एक अच्छे रिश्ता में जाते हैं और वेटर को अपना ऑन आर्डर देते हैं तो आप किचन में जाकर शेफ को यह नहीं बताते कि सब्जी कैसे काटनी है या मसाले कैसे मिलाने हैं। आप बस अपने ऑर्डर के आने का शांति से इंतजार करते हैं। आपका सबकॉन्शियस माइंड वो मास्टर शेफ है। आप अपने विचारों और भावनाओं के माध्यम से उसे अपना ऑर्डर देते
35:36 हैं। उस पर पूरा विश्वास रखें। उसके काम में डर और शक पैदा करके रुकावट ना डालें। आपके भीतर एक ऐसी चमत्कारिक शक्ति काम कर रही है जो आपके हर सपने को हकीकत में बदलने का रास्ता जानती है। आपको बस अपने रास्ते से हटना है और उस बुद्धिमत्ता को अपना काम करने देना है। चैप्टर फोर मेंटल हीलिंग इन एंशिएंट टाइम्स। इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो आपको ऐसी हजारों कहानियां मिलेंगी जहां चमत्कारिक रूप से लोगों की बीमारियां ठीक हो गई। प्राचीन काल में लोग मीलों की यात्रा करके पवित्र मंदिरों और तीर्थ स्थानों पर जाते थे। वे विशेष नदियों में नहाते थे। ताबीज पहनते थे और रहस्यमई अनुष्ठानों में हिस्सा लेते थे। अंधों को रोशनी मिल जाती थी। लकवाग्रस्त लोग अपने
36:22 पैरों पर खड़े हो जाते थे और लालाज बीमारियां रातोंरात गायब हो जाती थी। सदियों तक लोगों का यही मानना था कि यह सब देवी देवताओं या किसी बाहरी जादुई शक्ति का कमाल है। लेकिन डॉ जोसेफ मर्फी ने अपनी रिसर्च में एक बहुत ही अलग और गहरी सच्चाई को सामने रखा। उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में होने वाली यह सभी मानसिक और शारीरिक हीलिंग किसी बाहरी जादू का नतीजा नहीं थी। इन सभी चमत्कारों के पीछे केवल एक ही शक्ति काम कर रही थी। और वह थी मरीज का अपना सबकॉन्शियस माइंड और उसका पूर्ण विश्वास। इस रहस्य को समझने के लिए हमें समय में थोड़ा पीछे जाना होगा। कल्पना कीजिए कि आप हजारों साल पहले प्राचीन ग्रीस या मिस्र के किसी बड़े मंदिर में खड़े हैं। वहां का माहौल रहस्य और भव्यता
37:10 से भरा हुआ है। मंदिर के पुजारी विशेष प्रकार के कपड़े पहने हुए हैं। और वे अजीब सी धुनों में मंत्र गा रहे हैं। हवा में एक तेज और नशीली सुगंध है। एक बीमार व्यक्ति जो हफ्तों से दर्द में है उसे उस मंदिर में लाया जाता है। उसे कई दिनों तक उपवास रखने के लिए कहा जाता है ताकि उसका शरीर और दिमाग पूरी तरह से थक जाए। जब वह व्यक्ति शारीरिक रूप से कमजोर और मानसिक रूप से उस माहौल के प्रभाव में आ जाता है तो पुजारी उसे एक विशेष कमरे में सुला देते हैं जिसे स्लीप टेंपल कहा जाता था। पुजारी उसे बताते हैं कि रात को देवता उसके सपने में आएंगे और उसे पूरी तरह से ठीक कर देंगे। यह कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं थी। यह मनोविज्ञान का एक बहुत ही
37:55 शानदार इस्तेमाल था। जब वह मरीज उस अंधेरे कमरे में लेटता था तो उसका कॉन्शियस माइंड यानी तर्क करने वाला हिस्सा पूरी तरह से शांत और अभिभूत हो चुका होता था। उसमें यह सवाल करने की ताकत ही नहीं बचती थी कि यह कैसे होगा। उसका वॉचमैन अपनी जगह से हट चुका होता था और जब मरीज गहरी नींद में जाने लगता था तब पुजारी धीरे से उसके कान में फुसफुसाते थे कि अब तुम्हारे शरीर की हर बीमारी खत्म हो रही है और तुम कल सुबह एकदम स्वस्थ उठोगे क्योंकि मरीज के अंदर पुजारियों और मंदिर के प्रति एक अंधविश्वास पैदा हो चुका था। इसलिए यह सुझाव या सजेशन सीधे उसके सबकॉन्शियस माइंड में गहराई तक उतर जाता था। उसका दिमाग बिना किसी शक के इस बात को सच मान
38:41 लेता था और शरीर के अंदर एक जबरदस्त हीलिंग प्रक्रिया शुरू हो जाती थी। अगले दिन जब वह व्यक्ति उठता तो उसकी बीमारी सच में गायब हो चुकी होती थी। पुजारियों को शायद आधुनिक न्यूरो साइंस या इम्यून सिस्टम के बारे में कुछ नहीं पता था। लेकिन वे मानव मनोविज्ञान को बहुत अच्छी तरह समझते थे। वे जानते थे कि किसी भी इंसान का शरीर तब तक ठीक नहीं हो सकता जब तक उसका दिमाग उस पर पूरा विश्वास ना कर ले। जो ताबीज वे मरीजों को देते थे या जो पवित्र पानी वे उन्हें पिलाते थे उनमें कोई जादुई रसायन नहीं होता था। वे केवल एक मनोवैज्ञानिक टूल थे। वे चीजें मरीज के दिमाग में एक ट्रिगर का काम करती थी। जब मरीज उस ताबीज को देखता था तो उसे याद आता था कि वह सुरक्षित है और उसका शरीर हील हो रहा है। सारा कमाल उस अंधविश्वास का था जो
39:28 उस ताबीज से जुड़ा हुआ था। आपका सबकॉन्शियस माइंड यह नहीं देखता कि आप किस चीज पर विश्वास कर रहे हैं। वह केवल आपके विश्वास की गहराई को मापता है और उसी के अनुसार शरीर में बदलाव करना शुरू कर देता है। अगर आप सोचते हैं कि यह सब केवल प्राचीन काल में होता था और आज के आधुनिक और वैज्ञानिक युग में हम इन चीजों से बहुत आगे बढ़ चुके हैं। तो आप पूरी तस्वीर नहीं देख रहे होते हैं। आज तरीके बदल गए हैं। लेकिन सिद्धांत बिल्कुल वही है। प्राचीन काल के उन मंदिरों की जगह आज हमारे पास बड़े-बड़े और चमकदार अस्पताल हैं। पुजारियों के रहस्यमई कपड़ों की जगह आज डॉक्टरों ने सफेद कोट पहन लिए हैं। मंदिरों की जगह आज मेडिकल मॉनिटर्स की बीप सुनाई देती है। जब आप किसी बहुत मशहूर डॉक्टर के पास जाते हैं जिसकी क्लीनिक के
40:14 बाहर भारी भीड़ लगी होती है। तो आपके अंदर भी ठीक वैसा ही मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा होता है जैसा प्राचीन काल के उस मरीज के अंदर मंदिर में होता था। आपका दिमाग उस डॉक्टर की अथॉरिटी को स्वीकार कर लेता है और आपका कॉन्शियस माइंड तर्क करना बंद कर देता है। इसे साबित करने के लिए मेडिकल साइंस के इतिहास का एक बहुत ही मशहूर और दिलचस्प अध्ययन देखते हैं जो दिखाता है कि ब्लाइंड फेथ और अथॉरिटी आपके सबकॉन्शियस माइंड को कैसे प्रोग्राम करते हैं। कुछ साल पहले अमेरिका के एक बहुत ही प्रसिद्ध सर्जन डोबरूस मोजले ने घुटने के दर्द से परेशान मरीजों पर एक रिसर्च की। यह ऐसे मरीज थे जिनके घुटनों के कार्टिलेज पूरी तरह से घिस चुके थे और उन्हें चलने फिरने में भयानक पीड़ा होती थी। डॉक्टर ने इन
40:59 मरीजों को तीन ग्रुप्स में बांटा। पहले दो ग्रुप्स की असली सर्जरी की गई जिसमें उनके घुटनों को अंदर से साफ किया गया और खराब टिश्यू को हटा दिया गया। लेकिन असली खेल तीसरे ग्रुप के साथ खेला गया। तीसरे ग्रुप के मरीजों को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। उन्हें एनस्थीसिया देकर बेहोश किया गया। डॉक्टर ने उनके घुटने पर एक चीरा लगाया लेकिन अंदर कोई सर्जरी नहीं की। उसने केवल थोड़ा सा खारा पानी वहां छिड़का और उस चीरे को वापस सिल दिया। इसे मेडिकल भाषा में श्याम सर्जरी या नकली सर्जरी कहते हैं। जब यह मरीज होश में आए तो उन्हें बताया गया कि उनकी सर्जरी बहुत सफल रही है। अब ध्यान से सुनिए कि इसके बाद क्या हुआ। जिन मरीजों की असली सर्जरी हुई
41:44 थी उन्हें दर्द से राहत मिली जो कि सामान्य बात थी। लेकिन मेडिकल दुनिया तब हैरान रह गई जब तीसरे ग्रुप के उन मरीजों ने भी बताया कि उनका दर्द पूरी तरह से गायब हो गया है। उन्होंने बिना दर्द के चलना और सीढ़ियां चढ़ना शुरू कर दिया। कई सालों बाद भी वे पूरी तरह से ठीक थे। यह कैसे संभव हुआ? उनके घुटनों के अंदर तो कुछ बदला ही नहीं था। जवाब बहुत सीधा है। बदलाव उनके घुटनों में नहीं बल्कि उनके दिमाग में हुआ था। जब उन मरीजों को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया तो उस बड़े अस्पताल सफेद कोर्ट वाले डॉक्टर और मशीनों को देखकर उनके कॉन्शियस माइंड ने पूरा विश्वास कर लिया कि अब वे ठीक होने वाले हैं। उनका वॉचमैन हट गया और उनके सबकॉन्शियस माइंड ने यह आदेश ग्रहण कर लिया कि सर्जरी हो चुकी है और अब शरीर को
42:30 दर्द महसूस नहीं करना है। दिमाग ने तुरंत प्राकृतिक दर्द निवारक रसायन रिलीज करना शुरू कर दिया और उनके शरीर ने उसी विश्वास के आधार पर काम करना शुरू कर दिया। यह आधुनिक समय का प्लेसीबो इफेक्ट है जो प्राचीन काल की मेंटल हीलिंग का ही दूसरा नाम है। डोमर्फी कहते हैं कि दुनिया की कोई भी बाहरी चीज आपको तब तक ठीक नहीं कर सकती जब तक कि आपका अपना सबकॉन्शियस माइंड उस हीलिंग को स्वीकार ना कर ले। चाहे आप कोई बहुत महंगी दवा खा रहे हो या दुनिया के सबसे बेहतरीन डॉक्टर से इलाज करवा रहे हो। अगर आज अगर आपके मन में यह गहरा डर बैठा है कि आप कभी ठीक नहीं होंगे तो वह दवा आपके शरीर पर पूरी तरह से असर नहीं कर पाएगी। आपका नकारात्मक बिलीफ सिस्टम आपके शरीर की प्राकृतिक हीलिंग प्रक्रिया के रास्ते में एक दीवार खड़ी कर देगा। इसके विपरीत अगर आपके अंदर यह अटल विश्वास है
43:18 कि आप स्वस्थ हो रहे हैं तो आपका दिमाग आपके शरीर की हर एक कोशिका को नया जीवन दे सकता है। अब सवाल यह उठता है कि क्या अपने सबकॉन्शियस माइंड की इस शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए हमें किसी ताबीज, किसी मंदिर या किसी नकली सर्जरी की जरूरत है? बिल्कुल नहीं। प्राचीन काल के लोगों को यह शक्ति बाहर खोजनी पड़ती थी क्योंकि उन्हें अपने मन की कार्यप्रणाली का ज्ञान नहीं था। लेकिन आप यह जानते हैं कि असली खजाना और असली डॉक्टर आपके अपने भीतर मौजूद है। आपको किसी बाहरी अनुष्ठान पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। आपको बस अपने कॉन्शियस माइंड को शांत करना सीखना है ताकि आप सीधे अपने इंजन रूम तक सही निर्देश पहुंचा सकें। जब आपका कॉन्शियस माइंड शांत होता है तभी आपका सबकॉन्शियस माइंड सबसे ज्यादा
44:03 ग्रहणशील होता है। इस सिद्धांत को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उतारने के लिए एक बहुत ही शानदार उदाहरण लेते हैं। एक महिला जिसे सालों से भयानक माइग्रेन की समस्या थी। उसने कई डॉक्टरों को दिखाया लेकिन कोई दवा पूरी तरह से काम नहीं कर रही थी। वह हर रात इसी डर के साथ सोती थी कि कल सुबह उठते ही उसे फिर से दर्द का सामना करना पड़ेगा। उसका यह डर ही उसके सबकॉन्शियस माइंड के लिए एक आदेश बन चुका था। जब उसे दिमाग के इस प्राचीन रहस्य के बारे में पता चला तो उसने अपने बेडरूम को ही अपना स्लीप टेंपल बना लिया। उसने रात को सोने से पहले डरना बंद किया। इसके बजाय जब उसे नींद आने लगती और उसका शरीर बिल्कुल ढीला पड़ जाता तब वह कल्पना करती कि एक ठंडी और सुकून देने वाली ऊर्जा उसके दिमाग में बह रही है। वह खुद को यह सुझाव देती कि मैं
44:50 बिल्कुल शांत हूं और मेरा शरीर पूरी तरह से स्वस्थ है। शुरुआत में उसके कॉन्शियस माइंड ने इसे झूठ माना और तर्क करने की कोशिश की। लेकिन वह इस अभ्यास को लगातार करती रही। नींद के ठीक पहले के उस समय में जब उसका वॉचमैन थक कर सो जाता था। उसका यह नया सुझाव सीधा उसके सबकॉन्शियस माइंड में चला जाता था। कुछ ही हफ्तों में उसका माइग्रेन पूरी तरह से गायब हो गया। उसने बिना किसी मंदिर या ताबीज के उसी प्राचीन सिद्धांत का इस्तेमाल किया। उसने अपने विश्वास को एक टूल की तरह इस्तेमाल किया और अपने दिमाग को यह समझा दिया कि हीलिंग हो चुकी है। प्राचीन काल के पुजारियों का सबसे बड़ा रहस्य यह था कि वे मरीज के दिमाग से डर को निकालकर वहां पूर्ण
45:36 विश्वास स्थापित कर देते थे। आपको अपना खुद का पुजारी बनना है। आपको अपने मन के मंदिर में खड़े होकर खुद को वह सुझाव देना है जो डर को खत्म कर दे। जब आप यह समझ जाते हैं कि हीलिंग का स्रोत आपके अपने विचारों में है तो आप किसी चमत्कार का इंतजार नहीं करते बल्कि आप खुद अपने जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार बन जाते हैं। यह ज्ञान आपको आजाद करता है। यह आपको बताता है कि चाहे आपकी परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों ना हो, आपके पास हमेशा वह मानसिक उपकरण मौजूद है जो हर शारीरिक और मानसिक समस्या को सुलझा सकता है। जब आपके भीतर की प्रोग्रामिंग बदल जाती है तो आपका शरीर एक वफादार नौकर की तरह उस नए आदेश का पालन करने के लिए मजबूर हो जाता है। अब यह
46:21 देखना बहुत दिलचस्प होगा कि आधुनिक समय में जब विज्ञान बहुत आगे बढ़ चुका है तो हम इस प्राचीन रहस्य को और किन नए और सटीक तरीकों से अपने जीवन में लागू कर सकते हैं। चैप्टर फाइव मेंटल हीलिंग इन मॉडर्न टाइम्स। आज जब हम बीमार पड़ते हैं तो हम किसी प्राचीन मंदिर में नहीं जाते और ना ही किसी रहस्यमई अनुष्ठान का हिस्सा बनते हैं। हम सीधे आधुनिक अस्पतालों में जाते हैं जहां एमआरआई मशीनें हैं, लेजर सर्जरी है और दुनिया की सबसे बेहतरीन दवाइयां उपलब्ध है। हमें लगता है कि विज्ञान ने प्राचीन हीलिंग के उन सभी मनोवैज्ञानिक रहस्यों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। हम मानते हैं कि ठीक होना पूरी तरह से एक बाहरी रासायनिक या सर्जिकल प्रक्रिया है। लेकिन अगर आप आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और
47:07 मनोविज्ञान की गहराई में जाएंगे तो आपको एक बहुत ही चौंकाने वाली सच्चाई मिलेगी। आज भी चाहे डॉक्टर कितनी भी आधुनिक मशीन या शक्तिशाली दवा का इस्तेमाल कर ले असली हीलिंग आपका शरीर ही करता है और उस शरीर की हर एक कोशिका को कंट्रोल करने वाला मास्टर माइंड आज भी आपका सबकॉन्शियस माइंड ही है। डॉ जोसेफ मॉर्फी ने स्पष्ट रूप से समझाया है कि दुनिया में केवल एक ही यूनिवर्सल हीलिंग पावर है और वह आपके भीतर मौजूद है। अलग-अलग लोग इसे अलग-अलग नाम दे सकते हैं। कोई इसे प्रकृति की शक्ति कह सकता है। कोई इसे जीवन ऊर्जा कह सकता है और विज्ञान इसे इम्यून सिस्टम कह सकता है। लेकिन यह सब उसी एक सबकॉन्शियस बुद्धिमत्ता के अलग-अलग नाम है। जब एक सर्जन आपकी टूटी हुई हड्डी को सही जगह पर सेट करता है तो वह डॉक्टर उस हड्डी को
47:52 जोड़ता नहीं है। वह केवल उस हड्डी को अलाइन करता है। हड्डी को वापस जोड़ने का काम, नए टिश्यू बनाने का काम और उस जगह को पहले जैसा मजबूत बनाने का काम आपका सबकॉन्शियस माइंड करता है। अगर आपका दिमाग उस हीलिंग प्रक्रिया को रोक दे तो दुनिया का कोई भी सर्जन उस हड्डी को नहीं जोड़ सकता। आधुनिक समय में मानसिक हीलिंग कोई रहस्य नहीं है बल्कि यह इस बात की वैज्ञानिक समझ है कि आपका दिमाग और आपका शरीर एक ही सिस्टम के दो हिस्से हैं। आधुनिक मनोविज्ञान और साइकोन्यूरोइमोलॉजी हमें बताते हैं कि हमारा शरीर हमारे हर एक विचार को सुन रहा है। आपकी हर भावना आपके शरीर में एक रासायनिक प्रतिक्रिया पैदा करती है। जब आप अपने कॉन्शियस माइंड से किसी बात को लेकर बहुत ज्यादा तनाव में होते हैं तो आप अपने शरीर के प्राकृतिक
48:37 हीलिंग सिस्टम को बंद कर देते हैं। इस बात को एक बहुत ही शानदार आधुनिक केस स्टडी से समझते हैं जिसने मेडिकल दुनिया में दर्द को देखने का नजरिया पूरी तरह से बदल दिया। न्यूयॉर्क के एक बहुत प्रसिद्ध डॉक्टर थे जिनका नाम डो जॉन सारनो था। उनके पास देश भर से ऐसे मरीज आते थे जो सालों से भयानक बैक पेन यानी पीठ के दर्द से जूझ रहे थे। इन मरीजों ने दुनिया भर के बेहतरीन गद्दे खरीद लिए थे। सबसे महंगी फिजियोथेरेपी करवा ली थी और कई बार तो सर्जरी भी करवा ली थी लेकिन उनका दर्द खत्म नहीं होता था। डोर सारनो ने जब इन मरीजों के दिमाग का अध्ययन किया तो उन्होंने एक बहुत ही दिलचस्प पैटर्न देखा। उन्होंने पाया कि इनमें से ज्यादातर मरीजों की रीड की हड्डी में कोई वास्तविक खराबी नहीं थी। उनका
49:23 दर्द पूरी तरह से असली था। लेकिन उस दर्द का कारण फिजिकल नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक था। डॉसो ने अपनी रिसर्च में बताया कि इन मरीजों का सबकॉन्शियस माइंड एक बहुत ही चालाक खेल खेल रहा था। यह मरीज अपनी जिंदगी में किसी ना किसी भारी तनाव, गहरे गुस्से या असंतोष से गुजर रहे थे। जिसे वे अपने कॉन्शियस माइंड में स्वीकार नहीं करना चाहते थे। उनका अवचेतन मन यह जानता था कि अगर यह मरीज अपनी भावनात्मक पीड़ा का सामना करेंगे तो वे टूट जाएंगे। इसलिए उनके सबकॉन्शियस माइंड ने उनका ध्यान भटकाने के लिए उनके शरीर में एक असली और भयानक दर्द पैदा कर दिया। जब मरीज का पूरा ध्यान अपनी पीठ के दर्द पर होता था तो उसे अपनी जिंदगी की असली समस्याओं के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिलता था। डोसारनो
50:09 ने इस कंडीशन को नाम दिया और मरीजों का इलाज एक बिल्कुल नए तरीके से शुरू किया। उन्होंने मरीजों को कोई दवा नहीं दी। इसके बजाय उन्होंने मरीजों को यह समझाना शुरू किया कि उनका शरीर बिल्कुल ठीक है और यह सारा दर्द उनका अपना दिमाग पैदा कर रहा है। शुरुआत में मरीजों के कॉन्शियस माइंड ने इस बात का कड़ा विरोध किया। वे गुस्से में कहते हैं कि हम सालों से दर्द में है और आप कह रहे हैं कि यह सिर्फ हमारे दिमाग में है। लेकिन जैसे-जैसे डोसा ने उन्हें उनके सबकॉन्शियस माइंड के काम करने का तरीका समझाया। मरीजों ने इसे स्वीकार करना शुरू किया। उन्होंने अपने मन के पहरेदार को शांत किया और अपनी दबी हुई भावनाओं का सामना किया और जैसे ही उनके सबकॉन्शियस माइंड को यह संदेश मिला कि अब दर्द पैदा करके ध्यान भटकाने की जरूरत नहीं है। उनका
50:56 सालों पुराना पीठ का दर्द चमत्कारिक रूप से कुछ ही हफ्तों में हमेशा के लिए गायब हो गया। यह केस स्टडी डोमर्फी के उसी सिद्धांत को सही साबित करती है कि आपका दिमाग आपके शरीर को पूरी तरह से नियंत्रित करता है। अगर कोई बीमारी आपके सबकॉन्शियस बिलीफ के कारण पैदा हुई है तो दुनिया की कोई भी बाहरी दवा उसे तब तक हमेशा के लिए ठीक नहीं कर सकती जब तक कि आप उस बिलीफ को ना बदल दें। जब वह विचार बदल जाता है तो बीमारी अपने आप शरीर छोड़ देती है। इस माइंड बॉडी कनेक्शन को समझने के लिए एक और पहलू को देखना बहुत जरूरी है जिसे आधुनिक विज्ञान में एनोसीबो इफेक्ट कहा जाता है। हमने पिछले अध्याय में प्लेसीबो इफेक्ट के बारे में बात की थी। जहां एक सकारात्मक विश्वास शरीर को ठीक कर देता है। नसीबो इफेक्ट उसका बिल्कुल उल्टा है। जहां एक
51:41 नकारात्मक विश्वास एक पूरी तरह से स्वस्थ शरीर को बर्बाद कर देता है। यह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि आपका सबकॉन्शियस माइंड आपके शरीर का राजा है। एक बहुत ही मशहूर मेडिकल केस है। जहां एक व्यक्ति को अस्पताल में रूटीन चेकअप के लिए ले जाया गया। दुर्भाग्य से लैब में रिपोर्ट्स आपस में बदल गई। जब डॉक्टर ने उस व्यक्ति को उसके टेस्ट के नतीजे बताए तो डॉक्टर ने बहुत ही गंभीर आवाज में कहा कि उसे एक बहुत ही खतरनाक बीमारी है और उसके पास जीने के लिए केवल कुछ ही महीने बचे हैं। वह व्यक्ति उस समय बिल्कुल स्वस्थ था। लेकिन उस बड़े अस्पताल और डॉक्टर की बातों ने उसके मन के पहरेदार को सुला दिया और यह खौफनाक विचार सीधे उसके सबकॉन्शियस माइंड में एक कमांड की तरह उतर गया। उसके अवचेतन
52:27 मन ने इस बात को परम सत्य मान लिया कि अब शरीर को मरना है। अगले ही दिन से उस व्यक्ति का शरीर कमजोर होने लगा। उसकी भूख खत्म हो गई। उसका वजन तेजी से गिरने लगा और कुछ ही हफ्तों में वह बिस्तर से उठने लायक भी नहीं रहा। उसका शरीर सचमुच मरने की तैयारी कर रहा था। लेकिन तभी अस्पताल से एक फोन आया। उन्होंने माफी मांगते हुए बताया कि एक बहुत बड़ी गलती हो गई थी। जो रिपोर्ट उसे दी गई थी वह किसी और मरीज की थी। उस व्यक्ति को कोई बीमारी नहीं है और वह पूरी तरह से स्वस्थ है। जैसे ही यह नई जानकारी उस व्यक्ति के कॉन्शियस माइंड में गई और वहां से उसके अवचेतन मन तक पहुंची चमत्कार हो गया। कुछ ही दिनों के अंदर उसकी सारी ऊर्जा वापस लौट आई। उसका वजन बढ़ने लगा और वह फिर से पूरी तरह से
53:13 स्वस्थ हो गया। उस व्यक्ति के शरीर में कोई बीमारी थी ही नहीं। जो कुछ भी हुआ वह केवल उसके सबकॉन्शियस माइंड की ताकत थी। जब दिमाग ने मौत के विचार को स्वीकार किया तो उसने शरीर को खत्म करने वाले रसायन रिलीज कर दिए और जब दिमाग ने जीवन के विचार को स्वीकार किया तो उसने फिर से शरीर को जीवन ऊर्जा से भर दिया। यह कहानी हमें एक बहुत ही गहरी चेतावनी देती है। आज की दुनिया में हम अनजाने में अपने दिमाग को कितने गलत सुझाव देते रहते हैं। जब हमें शरीर में कोई छोटा सा भी दर्द होता है तो हम तुरंत इंटरनेट पर उसके लक्षण खोजने लगते हैं। वहां हमें सबसे खतरनाक बीमारियों के नाम दिखाई देते हैं। हम डर जाते हैं और हमारा सबकॉन्शियस माइंड उस डर को एक निर्देश मानकर शरीर में वैसा ही तनाव पैदा कर देता है। हम खुद अपने शरीर
54:01 के सबसे बड़े दुश्मन बन जाते हैं। डोमर्फी सिखाते हैं कि आधुनिक समय में मेंटल हीलिंग का सबसे पहला नियम यह है कि आपको अपने दिमाग में किसी भी बीमारी या डर के विचार को टिकने नहीं देना है। जब आपका कॉन्शियस माइंड शांत होता है और किसी बात पर पूरा विश्वास कर लेता है तभी आपका सबकॉन्शियस माइंड उसे हकीकत में बदलता है। इसलिए अगर आप किसी शारीरिक या मानसिक चुनौती का सामना कर रहे हैं तो आपको सबसे पहले अपने कॉन्शियस माइंड को शांत करना सीखना होगा। जब तक आप तनाव में हैं, घबराहट में हैं और यह सोच रहे हैं कि मेरा क्या होगा तब तक आपका अवचेतन मन आपके शरीर को हील नहीं कर सकता। आधुनिक समय में मानसिक हीलिंग की एक बहुत ही कारगर और वैज्ञानिक तकनीक है जिसे आप हर दिन अभ्यास कर सकते हैं। इसे विजुअलाइजेशन और फीलिंग का कॉम्बिनेशन कहा जाता है। मान लीजिए आप
54:48 किसी बीमारी से रिकवर हो रहे हैं। आप दिन में दो बार एक ऐसी जगह पर बैठे जहां आपको कोई परेशान ना करे। अपनी आंखें बंद करें और अपने शरीर को पूरी तरह से रिलैक्स करें। अपने ध्यान को अपनी सांसों पर लाएं। विज्ञान बताता है कि जब आप ऐसा करते हैं तो आपके दिमाग की तरंगे बीटा से अल्फा स्टेट में चली जाती हैं। अल्फा स्टेट में आपका तर्क करने वाला दिमाग शांत हो जाता है और आपका सबकॉन्शियस माइंड बहुत ज्यादा ग्रहणशील हो जाता है। अब इस शांत अवस्था में आपको अपनी बीमारी के बारे में बिल्कुल नहीं सोचना है। आपको इस बात पर फोकस नहीं करना है कि आपको दर्द हो रहा है या डॉक्टर ने क्या कहा है? इसके बजाय आपको अपने दिमाग में उस दृश्य की कल्पना करनी है जहां आप पूरी तरह से स्वस्थ हैं। आपको खुद
55:34 को अपने पसंदीदा काम करते हुए देखना है। अगर आपको दौड़ना पसंद है तो खुद को दौड़ते हुए देखें। अगर आपको अपने परिवार के साथ खेलना पसंद है तो उस पल को विजुअलाइज करें। लेकिन केवल तस्वीर देखना काफी नहीं है। आपको उस भावना को महसूस करना है। आपको उस खुशी, उस ऊर्जा और उस आजादी को महसूस करना है जो पूरी तरह से स्वस्थ होने पर मिलती है। आपका सबकॉन्शियस माइंड शब्दों या तस्वीरों से ज्यादा आपकी भावनाओं पर प्रतिक्रिया करता है। जब आप उस खुशी और शांति को गहराई से महसूस करते हैं तो आपका दिमाग उसे एक वर्तमान हकीकत मान लेता है। वह तुरंत आपके नर्वस सिस्टम को संदेश भेजता है कि शरीर पूरी तरह से सुरक्षित और स्वस्थ है। तनाव वाले हार्मोन बनने बंद हो जाते हैं और हीलिंग वाले रसायन जैसे डोपामाइन, ऑक्सीटोसिन और एंडोरफिन आपके
56:21 शरीर में बहने लगते हैं। यह कोई जादू नहीं है। यह पूरी तरह से जीव विज्ञान और मनोविज्ञान का विज्ञान है। बहुत से लोग यह गलती करते हैं कि वे रिलैक्स होकर खुद से कहते हैं कि मैं बीमार नहीं हूं। मैं बीमार नहीं हूं। आपको ऐसा नहीं करना है। आपका सबकॉन्शियस माइंड नहीं शब्द को नहीं समझता। जब आप कहते हैं कि मैं बीमार नहीं हूं तो आपका दिमाग अभी भी बीमारी पर ही फोकस कर रहा है। आपको हमेशा उस चीज पर फोकस करना है जो आप चाहते हैं। आपको कहना है कि मेरा शरीर पूरी तरह से स्वस्थ, ऊर्जावान और मजबूत है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको आधुनिक चिकित्सा या डॉक्टरों को नकार देना है। डोमर्फी कभी यह नहीं कहते कि आप दवाएं छोड़ दें या डॉक्टर के पास जाना बंद कर दें। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इंसान की ही बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन आपको यह समझना होगा कि
57:06 दवा केवल एक सहायक है। असली डॉक्टर आपके भीतर बैठा है। जब आप कोई दवा लेते हैं तो इस विश्वास के साथ लें कि यह आपके सबकॉन्शियस माइंड की हीलिंग शक्ति को और तेज कर रही है। जब आप डॉक्टर से मिले तो उनके इलाज पर पूरा भरोसा रखें। जब आपका मन शंकाओं से मुक्त होता है तो वही दवा 100 गुना ज्यादा असर करती है। आधुनिक समय में मेंटल हीलिंग का असली मतलब है अपने शरीर और अपने दिमाग के बीच एक तालमेल बिठाना। यह इस बात को स्वीकार करना है कि आपके विचार, आपके विश्वास और आपकी भावनाएं आपके शारीरिक स्वास्थ्य के सबसे बड़े आर्किटेक्ट हैं। जब आप हर रात सोने से पहले अपने शरीर को धन्यवाद देते हैं, उसकी हीलिंग की क्षमता पर पूरा विश्वास जताते हैं और सुबह एक नई ऊर्जा के साथ उठते हैं तो आप यह अपने भीतर की उस चमत्कारिक शक्ति
57:54 को जगा रहे होते हैं जो किसी भी चुनौती का सामना कर सकती है। यह ज्ञान आपको कभी भी बेबस महसूस नहीं होने देता। यह आपको बताता है कि स्वास्थ्य कोई ऐसी चीज नहीं है जो किस्मत से मिलती है बल्कि यह एक ऐसी अवस्था है जिसे आप अपने विचारों की शक्ति से खुद निर्मित करते हैं। जब आप अपनी सोच को पूरी तरह से अपने कंट्रोल में ले लेते हैं तो आपका जीवन उन परिणामों की तरफ बढ़ने लगता है जो आपको और आपके आसपास के लोगों को हैरान कर देंगे। अब यह समझना बहुत रोमांचक होगा कि मानसिक हीलिंग के इन सिद्धांतों को हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की बहुत ही व्यावहारिक समस्याओं और लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं। चैप्टर सिक्स प्रैक्टिकल टेक्निक्स इन
58:40 मेंटल हीलिंग। जब कोई इंजीनियर एक बहुत बड़ा पुल बनाता है तो वह सिर्फ उस पुल के बारे में सोचकर या उसकी कामना करके काम पूरा नहीं करता। उसके पास एक तय तरीका होता है, एक ब्लूप्रिंट होता है और विज्ञान के कुछ ठोस नियम होते हैं। वह जानता है कि किस मिट्टी पर कितनी गहरी नीव डालनी है और केबल्स को किस एंगल पर मोड़ना है। उसके पास हर कदम के लिए एक स्पष्ट तकनीक होती है। ठीक इसी तरह आपके जीवन और आपके दिमाग को बदलने के लिए भी केवल इच्छा होना काफी नहीं है। आपको अपने सबकॉन्शियस माइंड को निर्देशित करने के लिए कुछ सटीक और आजमाई हुई तकनीकों की आवश्यकता होती है। डॉ जोसेफ मर्फी ने दुनिया भर में हीलिंग और सफलता के जो चमत्कार देखे उनके पीछे कोई रहस्यमई जादू नहीं था बल्कि बहुत ही व्यावहारिक
59:27 तकनीकें थी। आज मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस भी इस बात को मानते हैं कि आपका दिमाग एक बहुत ही तार्किक मशीन की तरह काम करता है। अगर आप सही इनपुट डालेंगे तो आपको हमेशा सही आउटपुट मिलेगा। सबसे पहली और शायद सबसे शक्तिशाली तकनीक है विजुअलाइजेशन यानी मानसिक तस्वीर बनाने की कला। इसे मानसिक फिल्म या मेंटल मूवी टेक्निक भी कहा जाता है। दुनिया के सबसे बेहतरीन एथलीट्स और परफॉर्मर्स इस तकनीक का इस्तेमाल हर दिन करते हैं। यह तकनीक इस वैज्ञानिक तथ्य पर आधारित है कि आपका सबकॉन्शियस माइंड असलियत और कल्पना के बीच का अंतर नहीं जानता। जब आप पूरी एकाग्रता के साथ अपने दिमाग में कोई तस्वीर देखते हैं तो आपके दिमाग में बिल्कुल वही न्यूरल पाथवे सक्रिय होते हैं जो असल काम करते समय होते हैं। स्पोर्ट्स साइकोलॉजी में
1:00:14 इसे बहुत गंभीरता से लिया जाता है क्योंकि जब आपके किसी काम को अपने दिमाग में करते हैं तो आपकी मांसपेशियां भी सूक्ष्म स्तर पर उसी तरह से प्रतिक्रिया करती हैं। एक बहुत ही शानदार आधुनिक उदाहरण एक प्रोफेशनल एथलीट का है जो एक भयानक कार एक्सीडेंट के बाद कई महीनों तक अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा रहा। उसकी हड्डियां टूट चुकी थी और डॉक्टरों ने कहा था कि उसका दोबारा उस स्तर पर खेलना लगभग असंभव है। लेकिन उस एथलीट ने हार नहीं मानी। उसने अपने अस्पताल के बिस्तर को ही अपना प्रैक्टिस ग्राउंड बना लिया। क्योंकि वह शारीरिक रूप से हिल नहीं सकता था। इसलिए उसने अपने दिमाग में अपना खेल खेलना शुरू किया। हर दिन वह आंखें बंद करके खुद को मैदान पर खड़ा महसूस करता। वह अपने हाथों में उस ऊर्जा को महसूस करता और मैदान की महक को अपनी सांसों में भरता। उसने केवल
1:01:01 तस्वीर नहीं देखी बल्कि उसने उस पूरी प्रक्रिया को अपनी भावनाओं के साथ जिया। उसका कॉन्शियस माइंड जानता था कि वह बिस्तर पर पड़ा है। लेकिन उसका सबकॉन्शियस माइंड उस पूरी फिल्म को हकीकत मान रहा था। वह हर दिन घंटों तक पूरा गेम अपने दिमाग में खेलता था। इस दौरान उसका दिमाग उसकी मांसपेशियों को वही सिग्नल भेज रहा था जो असल में खेलते समय भेजे जाते हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि जब वह व्यक्ति शारीरिक रूप से चलने लायक हुआ और रिकवरी के बाद पहली बार वापस मैदान पर गया तो उसका गेम और उसकी मानसिक मजबूती पहले से भी ज्यादा शानदार थी। उसकी मांसपेशियों की मेमोरी ने कुछ भी नहीं बुलाया था क्योंकि उसका सबकॉन्शियस माइंड लगातार प्रैक्टिस कर रहा था। यह विजुअलाइजेशन की असली ताकत है। आपको अपने दिमाग में वह फिल्म तब तक चलानी
1:01:46 है जब तक कि वह आपके दिमाग की वायरिंग का हिस्सा ना बन जाए। एक और बहुत ही प्रभावी तरीका है जिसे बोधन टेक्निक कहा जाता है। चार्ल्स बडोइन एक फ्रांसीसी मनोचिकित्सक थे। जिन्होंने सबकॉन्शियस माइंड की प्रोग्रामिंग का एक बहुत ही सरल तरीका खोजा। उन्होंने देखा कि जब लोग अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए बहुत लंबे और जटिल वाक्य बोलते हैं तो उनका कॉन्शियस माइंड उन वाक्यों से बहस करने लगता है। इसलिए उन्होंने एक नया तरीका निकाला। इस तकनीक में आपको अपनी पूरी इच्छा या समस्या के समाधान को एक बहुत ही छोटे से वाक्य में समेटना होता है। यह वाक्य इतना छोटा होना चाहिए जिसे आप एक लोरी या मंत्र की तरह आसानी से दोहरा सके। मान लीजिए एक युवा स्टार्टअप फाउंडर बहुत
1:02:33 भारी कर्ज में डूबा हुआ है और उसका बिजनेस लगातार घाटे में जा रहा है। अगर वह रात को सोते समय यह सोचेगा कि कल मुझे बैंक का पैसा चुकाना है या नया क्लाइंट पता नहीं पैसे देगा या नहीं तो उसका दिमाग तनाव में आ जाएगा। इसके बजाय वह बोधन टेक्निक का इस्तेमाल कर सकता है। उसे अपने शरीर को पूरी तरह से रिलैक्स करना है और नींद की उस हल्की अवस्था में जाना है जहां दिमाग शांत होता है। फिर उसे एक छोटा सा वाक्य चुनना है जैसे सब कुछ बहुत शानदार तरीके से सुलझ रहा है। उसे इस वाक्य को बार-बार बहुत ही धीमी और शांत आवाज में दोहराना है। जब वह ऐसा करता है तो उसका कॉन्शियस माइंड कोई तर्क नहीं लड़ा पाता और वह छोटा सा सकारात्मक विचार सीधे उसके इंजन रूम
1:03:18 में पहुंच जाता है। नींद से ठीक पहले का समय जिसे विज्ञान में थेटा ब्रेन वेव स्टेट कहा जाता है। आपके सबकॉन्शियस माइंड को प्रोग्राम करने का सबसे बेहतरीन समय होता है। इसे डोमफी स्लीप टेक्निक कहते हैं। जब आप नींद की गहराई में जा रहे होते हैं तो आपके कॉन्शियस माइंड का पहरेदार हो जाता है। उस समय आप जो भी विचार अपने दिमाग में लाते हैं, वह बिना किसी रुकावट के आपके अवचेतन मन में गहरा उतर जाता है। आधुनिक नींद विज्ञान हमें बताता है कि आप जिस आखिरी विचार के साथ सोते हैं, आपका दिमाग रात भर उसी विचार के इर्द-गिर्द काम करता है और सुबह उसी ऊर्जा के साथ आपको जगाता है। अगर आप रात को चिंता और डर के साथ सोते हैं तो आपका दिमाग रात भर तनाव
1:04:06 पैदा करने वाले रसायनों का निर्माण करेगा। लेकिन अगर आप रात को यह महसूस करते हुए सोते हैं कि आप पूरी तरह से सुरक्षित और सफल हैं तो आपका दिमाग रात भर आपको हील करेगा और नए समाधान खोजेगा। इसके बाद आती है थैंक यू टेक्निक जो सीधे तौर पर कृतज्ञता या ग्रेटट्यूड के मनोविज्ञान पर आधारित है। अक्सर लोग जब भी कुछ पाना चाहते हैं तो वे एक कमी की भावना से मांगते हैं। वे कहते हैं कि मुझे पैसा चाहिए। मुझे स्वास्थ्य चाहिए। जब आप यह कहते हैं कि आपको कुछ चाहिए तो आप अनजाने में अपने सबकॉन्शियस माइंड को यह बता रहे होते हैं कि आपके पास उस चीज की कमी है। आपका अवचेतन मन उस कमी की भावना को स्वीकार कर लेता है और आपके जीवन में और
1:04:52 ज्यादा कमी पैदा कर देता है। इसके विपरीत जब आप धन्यवाद देते हैं तो आप अपने दिमाग को यह सिग्नल देते हैं कि आपको वह चीज मिल चुकी है। एक बहुत ही प्रेरणादायक कहानी एक ऐसी महिला की है जो अपने परिवार के टूटते हुए रिश्तों को लेकर बहुत परेशान थी। घर में हर रोज तनाव रहता था और शांति पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी। उसने कई बार अपने परिवार वालों को बदलने की कोशिश की लेकिन हालात और खराब होते गए। फिर उसने इस तकनीक को आजमाने का फैसला किया। उसने किसी से बहस करना बंद कर दिया। इसके बजाय हर सुबह उठकर और हर रात सोने से पहले वह शांत बैठती और पूरे दिल से कहती कि हमारे घर में मौजूद इस अद्भुत शांति और प्यार के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। शुरुआत में उसके
1:05:37 कॉन्शियस माइंड ने कहा कि तुम झूठ बोल रही हो। घर में कोई शांति नहीं है। लेकिन उसने अपने तर्क करने वाले दिमाग की आवाज को नजरअंदाज किया और उस धन्यवाद की भावना को महसूस करना जारी रखा। कुछ ही हफ्तों के भीतर एक बहुत ही रहस्यमई बदलाव शुरू हुआ। घर के लोगों का व्यवहार बदलने लगा। जो बातें पहले एक बड़ी बहस का रूप ले लेती थी, वे अब शांति से सुलझने लगी। उसने बाहरी दुनिया में कुछ नहीं बदला था। उसने केवल अपने भीतर की फ्रीक्वेंसी को बदल दिया था। विज्ञान के अनुसार कृतज्ञता आपके दिमाग में डोपामाइन और सेरोटोिनिन रिलीज करती है जो आपको तुरंत एक पॉजिटिव मानसिक अवस्था में ले जाते हैं। जब आपका सबकॉन्शियस माइंड इस पूर्णता और खुशी की भावना को महसूस करता है तो वह बाहर की दुनिया में भी उसी के अनुरूप परिस्थितियां पैदा करने
1:06:23 लगता है। मानसिक हीलिंग में अफरमेटिव मेथड का भी एक बहुत बड़ा स्थान है। यह तकनीक इस बात पर आधारित है कि आप सच्चाई को पूरी तरह से स्वीकार करते हैं। जब आप कहते हैं कि दो और दो चार होते हैं तो आप किसी से बहस नहीं कर रहे होते। आप बस एक सच्चाई बयान कर रहे होते हैं। आपको इस बात पर कोई शक नहीं होता। इसी तरह जब आप अपने स्वास्थ्य या सफलता को लेकर एक अफमेशन देते हैं तो आपको उसे एक अटल सच्चाई की तरह बोलना होता है। आपको अपने दिमाग से कोई उम्मीद नहीं लगानी है बल्कि आपको एक स्पष्ट निर्देश देना है। अगर आप बीमार हैं तो आपको यह नहीं कहना है कि काश मैं ठीक हो जाऊं। आपको बहुत ही स्पष्ट और शांत तरीके से कहना है कि मेरे शरीर को बनाने वाली बुद्धिमत्ता इस वक्त मेरे शरीर की हर कोशिका को पूरी तरह से स्वस्थ कर रही है।
1:07:10 जब आप इस बात को पूरे अधिकार और विश्वास के साथ कहते हैं तो आपका दिमाग उस आदेश को तुरंत मान लेता है। यह कोई इच्छा नहीं है। यह एक फैक्ट है जिसे आप अपने सबकॉन्शियस माइंड के सामने रख रहे हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप अपने सिस्टम में कोई कमांड टाइप करते हैं और एंटर दबाते हैं। आप यह नहीं सोचते कि सिस्टम काम करेगा या नहीं। आप जानते हैं कि वह काम करेगा। अंत में एक और बहुत ही दिलचस्प तकनीक है जिसे आर्गुमेंटेटिव मेथड कहा जाता है। यह उन लोगों के लिए बहुत कारगर है जिनका तर्क करने वाला दिमाग बहुत ज्यादा हावी रहता है। इस तकनीक में आप असल में अपने ही नकारात्मक विचारों के खिलाफ एक वकील की तरह जिरह करते हैं। डोमर्फी ने इसे प्राचीन हीलर्स के काम से प्रेरित होकर बताया था। आधुनिक समय में मनोविज्ञान की
1:07:57 एक बहुत ही प्रसिद्ध शाखा जिसे कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी या सीबीटी कहा जाता है। इसी सिद्धांत पर काफी हद तक काम करती है। इसमें आप अपने डराने वाले विचारों को सच नहीं मानते बल्कि आप उनसे सवाल करते हैं और उन्हें गलत साबित करते हैं। मान लीजिए आपके मन में विचार आता है कि मैं यह प्रोजेक्ट खराब कर दूंगा। एक आम इंसान इस विचार से डर जाएगा। लेकिन अगर आप आर्गुमेंटेटिव मेथड का इस्तेमाल करते हैं तो आप अपने ही विचार से बहस करेंगे। आप खुद से कहेंगे कि यह सच नहीं है क्योंकि मैंने इस विषय पर बहुत अच्छी रिसर्च की है। मेरे पास पूरा ज्ञान है और मेरा सबकॉन्शियस माइंड मुझे सही समय पर सही फैसले लेने में मदद करेगा। इसलिए मेरे फेल होने का कोई तार्किक कारण नहीं है। जब आप अपने डर को इस तरह तर्क के साथ काटते हैं तो आपका कॉन्शियस माइंड हार मान लेता है।
1:08:44 उसे समझ आ जाता है कि डर का कोई ठोस आधार नहीं है। और जैसे ही डर खत्म होता है, आपके इंजन रूम को सफलता का स्पष्ट संदेश मिल जाता है। यह सभी तकनीकें कोई जादुई टोटके नहीं है बल्कि यह आपके दिमाग को रिप्रोग्राम करने के मनोवैज्ञानिक टूल हैं। आपको इन सभी तकनीकों का इस्तेमाल एक साथ करने की जरूरत नहीं है। आप वह तकनीक चुन सकते हैं जो आपके स्वभाव और आपकी स्थिति के लिए सबसे ज्यादा सही महसूस हो। अगर आप कल्पना करने में अच्छे हैं तो मानसिक फिल्म चलाएं। अगर आपका दिमाग बहुत ज्यादा सोचता है तो सोते समय छोटे वाक्यों का इस्तेमाल करें या धन्यवाद की भावना को अपनाएं। सबसे जरूरी बात यह है कि आपको अपने भीतर बैठे उस मास्टर माइंड को सही निर्देश देना सीखना है। जब आप एक बार इन तकनीकों पर मास्टर हासिल कर लेते हैं तो
1:09:30 आप अपने जीवन के आर्किटेक्ट खुद बन जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि आपका दिमाग इन सकारात्मक निर्देशों को हमेशा स्वीकार क्यों करता है? और यह हमेशा आपको जीवन और विकास की तरफ ही क्यों ले जाना चाहता है? इसका जवाब जीवन के एक ऐसे बुनियादी नियम में छिपा है जो हर पल आपके भीतर काम कर रहा है और आपकी सफलता का इंतजार कर रहा है। का करूं? चैप्टर से द टेंडेंसी ऑफ द सबकॉन्शियस इज लाइफ वर्ड। क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि जब आप गलती से कोई खराब या जहरीला खाना खा लेते हैं तो आपका शरीर तुरंत क्या प्रतिक्रिया करता है? आपको उल्टी होने लगती है या बुखार आ जाता है। एक आम इंसान इसे बीमारी समझकर परेशान हो
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